Sunday, 11 August 2024

बच्चे तो समझ जायेंगे पर बडों को कौन समझायेगा

 

बच्चे तो समझ जायेंगे पर बडों को कौन समझायेगा 

घंटो-घंटो साथ में खेले,रुठे-मनाये गिरे-उठाये,

लडायी भी शामिल खेल में जिनके, जैसे सभी एक झाडू के तिनके,

कौन इनको आपस में जुडने से रोक पायेगा,

बच्चे तो समझ जायेंगे पर बडों को कौन समझायेगा ।।

 

बच्चों के जीवन के रस में, अपनी झूठी अहंकारिता को घोल,

जिन हरकतो से बच्चे बनते बच्चे, उनके दोषों का जो पीटे ढोल,

अतिरिक्त ध्यान से क्या तू उनको अधिक खुश रख पायेगा,

बच्चे तो समझ जायेंगे पर बडों को कौन समझायेगा ।।

 

परिवार उस माला को कहते,जिसमें बींधे है मोती अनेक,

छोटे-मोटे उपर-नीचे गोल-बेढोल काला गोरा,

जैसे होते जहाँ  भी होते,करते इस माला को पूरा,

जो तू  इसमें फूट कभी चाहे-अनचाहे डालेगा,

करके दुःखी उस पूर्ण समूह को क्या तू खुश रह पायेगा,

बच्चे तो समझ जायेंगे पर बडों को कौन समझायेगा ।।

 

अन-बन बन-बन बन-बन अनबन,  मैं-तू तू-मैं तेरा-मेरा पन,

होते यह सब हर पल हर जन,पर बैठा ना इनकों मन में पन,

अन्त में ठोके गा सिर को तू जो तू हमपन न देख पायेगा,

बच्चे तो समझ जायेंगे पर बडों को कौन समझायेगा ।।

 

मिल- बाट कर होते जो कार्य, होते सभी उन में अनिवार्य,

रखकर खुद के नाम को आगे यश न देकर साथी के भागे,

क्या इस समूहात्मक कार्य को तू अकेला ही कर पायेगा,

बच्चे तो समझ जायेंगे पर बडों को कौन समझायेगा ।।

 

देश(जहाँ पर)  में रहकर देश(जहाँ) का खाये, इससे/जिससे  पा सब विदेश(सब ओर) को जाये,

कुछ ना अर्पण करके भी जो,खुद के देश(मूल) पर बैठे पछताये,

जहाँ से सीखा होना खडा, जहाँ से भाग विश्व में जो हुआ बडा,

क्या तू अपने अस्तित्व को इससे अलग कर पायेगा,

बच्चे तो समझ जायेंगे पर बडों को कौन समझायेगा ।।

 

घर में रूठे मुँह को लेकर जो  बाहरी खुशियाँ मनायेगा,

गैस पे रखकर के खिचडी को, जो बातों में ही पकवान पकायेगा,

बुद्धिमत्ता की पुकार लगाकर, जो इन विडम्बनाओं को न देख पायेगा,

क्या इन झूठे आडम्बरो से तू अपने रिश्तों को बचा पायेगा,

बच्चे तो समझ जायेंगे पर बडों को कौन समझायेगा ।।

 

जो हम देखे वह सब देखे , सब वह सोचे जो हम सुझाये ,

जो हम बोले वह सब बोले , जो हम समझे उसको सराहे,

ऐसि सीधी दृष्टि से तू क्या दुनिया को गोल जान पायेगा ,

बच्चे तो समझ जायेंगे पर बडों को कौन समझायेगा ।।

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